पावस तुम्हारा सन्देश देता है
कल ........
पावस ऋतु की पहली बूँदजब मेरे माथे पर गिरी , तो लगा
कि मेरे दग्ध मस्तक पर तुमने
शीतल चुम्बन जडित कर मुझे उत्साहित किया
" पावस तुम्हारा स्वागत है ".......मैं पुकार उठी !
आज ........
भोर से सावन बरसता रहा , बरसता रहा तो लगा
कि तेरे बिछोह के विरह मैं
मेरे आंसुओं का साथ दे रहे हैं |
"प्रिये ये ऋतु भी आ गयी ".......मैं बुदबुदाई !
अभी .......
वर्षा थमी है पर , आकाश मेघ आछन्न है |
सांझ की सिन्दूरी आभा उसकी ओट मैं दुबक गयी, तो लगा ,
तुम्हारे बाहुपाश ने मुझे जकड लिया है |
"मैं यूँ न मानूंगी "........मैं बुदबुदाई |
सहसा .......
दक्षिण से आये बादलों के झुण्ड ने मुझे विश्रंखल किया
और संग आयी हवा ने मुझे छुआ , तो लगा ,
ये मेघदूत तुम्हारा ही सन्देश लाया है |
"आओ दूत ! आज हमारे आँगन उतरो "......मैं पुकार उठी|
nce poem............. But muje kuch lyn samaj me nhi aye.....
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