Saturday, 22 October 2011

Hindi poems

पावस तुम्हारा सन्देश देता है 

कल ........
पावस ऋतु की पहली बूँद 
          जब मेरे माथे पर गिरी , तो लगा
          कि मेरे दग्ध मस्तक पर तुमने
          शीतल चुम्बन  जडित कर मुझे उत्साहित किया
         " पावस तुम्हारा स्वागत है ".......मैं पुकार उठी !

           आज  ........
         
           भोर से सावन बरसता रहा , बरसता रहा तो लगा
           कि तेरे बिछोह के विरह मैं
            मेरे आंसुओं का साथ दे रहे हैं |
           "प्रिये ये  ऋतु भी आ गयी ".......मैं बुदबुदाई !

           अभी .......

           वर्षा थमी है पर , आकाश मेघ आछन्न है |
           सांझ की सिन्दूरी आभा   उसकी ओट मैं दुबक गयी,  तो लगा ,
           तुम्हारे बाहुपाश ने मुझे जकड लिया है |
           "मैं यूँ न मानूंगी "........मैं बुदबुदाई |

            सहसा .......

            दक्षिण से आये बादलों के झुण्ड ने मुझे विश्रंखल किया
            और संग आयी हवा ने मुझे छुआ , तो लगा ,
            ये मेघदूत तुम्हारा ही सन्देश लाया है |
            "आओ दूत ! आज हमारे आँगन उतरो "......मैं पुकार उठी|

 



1 comment:

  1. nce poem............. But muje kuch lyn samaj me nhi aye.....

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