Tuesday, 25 October 2011

आस 


मुझे चाहिये एक समुद्र ,
जिसमें विलीन होकर 
मैं अपना अस्तित्व खो दूं ,
एक नदी की तरह |
जिसकी लहरों मैं तरंगित होकर 
मैं अपने अन्दर की कडवाहट  भूल जाऊं |
जिसके तट पर बहने वाली हवा ,
मुझे थपकी देकर हर रात सुलाये |
और
भोर की पहली किरण जब मुझे जगाये ,
तो मैं तेरी प्रेयसी 
झुंझला कर 
फिर तेरी बाँहों मैं सो जाऊं |

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