Saturday, 22 October 2011

 सब जगह तुम हो 



मैने तुम्हें ढूँढा ....हर जगह 
फिर पाया भी |
गहन वन अरण्यों के अन्धकार मैं ,
सूर्य की प्रखर रश्मियाँ बन 
शाखाओं और पत्तों से छनकर 
तुमने अपनी उपस्तिथि दी |

तेज हवाओं मैं बहकर 
तुम ही तो चलकर मेरे पार आये 
और मेरे गालों को छूकर 
स्पर्श से अहसास करा गये |

यही नहीं ......और भी बहुत बार 
तुमको पाया |
इसी तरह जब मेने हर क्षण में,
तुम्हें ही महसूसा
तो भावों की तूलिका से ,
तुम्हें मन में चित्रित कर लिया |
फिर भी,
भटकती हूँ .......तुम्हें साकार देखने की इच्छा में |

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