Tuesday, 25 October 2011

आस 


मुझे चाहिये एक समुद्र ,
जिसमें विलीन होकर 
मैं अपना अस्तित्व खो दूं ,
एक नदी की तरह |
जिसकी लहरों मैं तरंगित होकर 
मैं अपने अन्दर की कडवाहट  भूल जाऊं |
जिसके तट पर बहने वाली हवा ,
मुझे थपकी देकर हर रात सुलाये |
और
भोर की पहली किरण जब मुझे जगाये ,
तो मैं तेरी प्रेयसी 
झुंझला कर 
फिर तेरी बाँहों मैं सो जाऊं |

Saturday, 22 October 2011

 सब जगह तुम हो 



मैने तुम्हें ढूँढा ....हर जगह 
फिर पाया भी |
गहन वन अरण्यों के अन्धकार मैं ,
सूर्य की प्रखर रश्मियाँ बन 
शाखाओं और पत्तों से छनकर 
तुमने अपनी उपस्तिथि दी |

तेज हवाओं मैं बहकर 
तुम ही तो चलकर मेरे पार आये 
और मेरे गालों को छूकर 
स्पर्श से अहसास करा गये |

यही नहीं ......और भी बहुत बार 
तुमको पाया |
इसी तरह जब मेने हर क्षण में,
तुम्हें ही महसूसा
तो भावों की तूलिका से ,
तुम्हें मन में चित्रित कर लिया |
फिर भी,
भटकती हूँ .......तुम्हें साकार देखने की इच्छा में |

Hindi poems

पावस तुम्हारा सन्देश देता है 

कल ........
पावस ऋतु की पहली बूँद 
          जब मेरे माथे पर गिरी , तो लगा
          कि मेरे दग्ध मस्तक पर तुमने
          शीतल चुम्बन  जडित कर मुझे उत्साहित किया
         " पावस तुम्हारा स्वागत है ".......मैं पुकार उठी !

           आज  ........
         
           भोर से सावन बरसता रहा , बरसता रहा तो लगा
           कि तेरे बिछोह के विरह मैं
            मेरे आंसुओं का साथ दे रहे हैं |
           "प्रिये ये  ऋतु भी आ गयी ".......मैं बुदबुदाई !

           अभी .......

           वर्षा थमी है पर , आकाश मेघ आछन्न है |
           सांझ की सिन्दूरी आभा   उसकी ओट मैं दुबक गयी,  तो लगा ,
           तुम्हारे बाहुपाश ने मुझे जकड लिया है |
           "मैं यूँ न मानूंगी "........मैं बुदबुदाई |

            सहसा .......

            दक्षिण से आये बादलों के झुण्ड ने मुझे विश्रंखल किया
            और संग आयी हवा ने मुझे छुआ , तो लगा ,
            ये मेघदूत तुम्हारा ही सन्देश लाया है |
            "आओ दूत ! आज हमारे आँगन उतरो "......मैं पुकार उठी|