Saturday, 14 April 2012

हर युग से प्रतीक्षारत 


 रही है प्रतीक्षा में  , ये चिर प्रतीक्षित मेरी व्यथा  ,
मेरा उद्धार करो !

शतदल पुष्पों पर भोर में रुके हुए ओस मोती ,
और रात्री की स्निग्ध चांदनी .....
पूछना हर प्रहरी से 
रहती  है ये बस तुम में ही।

राज कण से जलकण बरसाते मेघ
जब घनघोर गरज गरज कर
नीर बरसाते हैं तो
नाचती है मोर संग एक मीरा
हरि  धुन में आह्लाह्दित  होकर  ।

कब से व्याकुल प्रस्तर अहिल्या
होकर आशातीत जोहती  है बाट ,

गये दिनों से शबरी की मुंडेर पर कागा नहीं बोला ।
ये रमा किस शिव के लिये तपस्यारत है ?
इतना अवश्य है क़ि.........
है ये तेरी ही विरही विष्णु ,


हर युग से प्रतीक्षारत  ।